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देउवा जाईत ओली आइत, ओली जाईत दाहाल आईत – ई त्रिकोणभित्र कोनो जीवन नै छल, मृत्युबोध मात्रै छल । केवल सपनासबके चिहान मात्रै छल । नै कुछ होईत्, माछि नै मरत् कहाबात् सबगोटा थाहा छै, फिर स् घुमफिर यि होईत् स्थितिके दुश्चक्र कायम छै ।
चुनाव सम्पन्न भेल, निक भेल । चुनावके विरुद्धमे अनेक तर्क होईत् । जयमेस् कते सत्य होईत् । चुनाव शक्ति–सम्भ्रावना आ सत्ता–प्राप्तिके खेल हबे , कि करत् चुनाव ? कहेला । चुनाव शोषक वर्गके कोण समूह शासन करत् प्रतिस्पर्धा छै , जे समूह जिते श्रमजीवी जनतासबके कि मतलब, । चुनाव ‘वाहियात् हबे , बहिष्कार करु’ कहवालासब छितेछल । यदि लोकतान्त्रिक समाज राज्यमे आवधिक निर्वाचन केवल कानुनी व्यवस्था और संवैधानिक औपचारिकता मात्र नै , यी ‘गतिशीलता’ के एक लय छै । एक सुमधुर संगीत सहो छै

सबैके थाहे है– चुनावमे न्याय और सत्य जित हबे, अन्याय और असत्य हारत् कोनो ग्यारेन्टी नैहोई छै । चुनावी परिणामके आधार सत्य और असत्यबीचके लडाइँ, न्याय और अन्यायबीचके संघर्ष, ठीक और बेठीकबीचके छनोट मात्र नै । चुनावी परिणाम अनेक कारणसे प्रभावित होई छै । चुनावी परिणाममे शक्ति तथा संगठन संरचनाके प्रभाव होई छै । सामयिक वैचारिक और तर्क प्रणालीके प्रभाव होई छै । सामाजिक, सांस्कृतिक और सामुदायिक मनोविज्ञानके प्रभाव होई छै । धन और परिचालन क्षमताके प्रभाव होई छै ।

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